मनुष्य के साथ
ना उठने-बैठने की सजा है
तो होने दो
होने दो यह
मैं बनाता हूँ
दो शब्दों के खाली जगह के बीच
अभिव्यक्ति का घर
और ढह जाता है।
इस टूटन भरी ज़िंदगी में उनका लेखन गुमनामी के अंधेरे में छटपटाता रहा। इसी छटपटाहट की सुध लेने ये तीनो साथी उसके घर की ओर मुखातिब हुए थे। इन तीनो ने दलित साहित्य के सबस्से चर्चित कवि नामदेव ढसाळ और कवि-नाटककार कॉमरेड मनोहर वाकडे के समकालीन मराठी के कवि प्रकाश जाधव का जन्म 3 नवंबर 1951 को मूळ गाँव खेड, रत्नागिरी में हुआ। कक्षाआठवी से ही कविता लिखने लगे थे। बेहद गरीब परिवार था। अखबार बाँटकर matric पास किया और घर खर्च के लिए हाथ बंटाया। 1978 में पहला काव्यसंग्रह ‘दस्तक’ प्रकाशित हुआ। ‘असा ही एक हिंदुस्तान’ (ऐसा ही एक हिंदुस्तान), ‘नाटक – शाखा क्रमांक 120, दो उपन्यास – बड़ी संख्या में उनकी लिखित खो गई कविता की तलाश जारी है। लंबे अरसे से मानसिक बीमारी से जूझ रहे थे। ब्रेनहॅमरेज की वजह से अंतत: पत्नी निशा, कबीर, फैज और बुड़ी अम्मा को छोड़ विदा हो गए।
जाने-माने मराठी के कवि श्रीधर पवार ने प्रकाश जाधव के संदर्भ में एक अनुभव सुनाया – सामाजिक कार्यकर्ता सुबोध मोरे और कवि तुलसी परब के साथ वे खाद प्रकाश जाधव के घर पहुंचे। प्रकाश के घर तनाव फैला हुआ था। वह घर के सभी लोगों से झगड़कर कहीं और चला गया। घर से उसका संपर्क नहीं। बचा था। वैसे भी मुंबई के भीड़ में संबंधों को बनाए रखना बेहद मुश्किल हैं। इसी भीड़ में उसके कवि मित्र, दोस्त, कॉमरेड, परिवार के सदस्य और रिश्तेंदारों का भी संबंध न के बराबर था।
कहने-सुनने को तो अच्छा लगता है – अरे तुम तो सृजन से जुड़े हुए हो – नहीं लिख प रहे हो – यह सामाजिक अपराध है। साथियों के बुरे दिनों में उसे सँभलना चाहिए। हौसला अफजाई करना चाहिए। जिस कवि का एक महत्वपूर्ण कविता संकलन ‘दस्तक’ आठवें दशक में मराठी दलित कविता के केंद्र में रहा वह अपनी हालातों की वजह की वजह से मुंबई की भीड़ में अनजानी और अनचाही ज़िंदगी जी रहा था। यह हमें सोचने के लिए विवश करता है कि ‘सामाजिक अपराध’ किसका है – गुमनामी में खो गए लेखक का या सृजनशिल लोगों का – जिन्होंने प्रकाश की सुध नहीं ली और एक लंबे अरस तक उसके अर्टपुर्ण साहित्य को सामने नहीं ल पाये। प्रकाश की संवेदनशीलता इस निर्मम सामामजी-सांस्कृतिक और राजनीतिक ढांचे का भर सहन नहीं कर पाई। इस संदर्भ मीन उनकी यह कविता –
प्रकाश जाधव के साहित्य को सँजोने का कम किया। जो साहित्य उपलब्ध हो सका उसे इकठ्ठा किया॥ पहले प्रकाशित काव्य संग्रह ‘दस्तक’ के तर्ज पर ‘दस्तक के बाद की कविताएं’, प्रकाशित करने की योजना हाथ में ली गई।
मराठी के दलित साहित्य आंदोलन में कविता बड़ी तादाद में लिखी जा रही थी। आज तक दलित कवियों के काव्य संग्रह से गुजरने से एस महसूस होता है कि इन कवियों ने मराठी कविता के चहर्रे और रंग-रूप को ही बदल डाला है। उपेक्षित नारकीय जीवन को शब्दबद्ध करने का आविष्कार दलित कवियों की ही देन है। उपेक्षित जीवन, शोषितों के उत्पीड़न को, प्रकाश की कविताएं सामने लेकर आई हैं। वहीं कुलीन अकादमियों के मूल्यों को तोड़कर उन्होंने खुद का एक अलग रचना संसार गढ़कर नई इबारत खड़ी की है। सबसे बड़ी बात है कि पारम्पारिक मराठी कविता के कवियों द्वारा फैलाये गए कूड़ा-करकटों के ढेर को आज के दलित कवियों ने ब्यहरने का कम बहुत ही शिद्दत के साथ किया है। इस कतार में प्रकाश अग्रणी पंक्ति के कवि हैं। इस कूड़े-कर्कट से अलग एक और दुनिया है। इन कवियों का उनका अपना संसार भी है। इस दुनिया का भाव-विश्व है, उसका शब्द भंडार है, शोषण-उत्पीड़न है, दुख-दर्द और संघर्ष है। इसे आविष्कार का बाल्यकाल भी कहा जा सकता है। बाल्यकाल का अर्थ बचपने से हैं। बचपन का रोना-धोना, प्रेम और क्रोध, मासूमियत भरी हंसी, दिल में महामानव बुद्ध की करुणा और नक्सलवादियों जैसा आक्रोश, आदि के स्वर कविता में देखे जा सकते हैं। इस संघर्ष की रह में प्रकाश जाधव की कविताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कुछ अपवाद को छोड़कर दलित कविता के अनुभव जगत में साधारणत: गाँव के बाहर दलितों पर होने वाले अन्याय, अत्याचार और चातुर्वण व्यवस्था की वजह से मानहानि, नाकेबंदी की उपस्थिती हैं। इन सब की परिणिति के स्वरूप उभरा संघर्ष एक लड़ाकू प्रवृति का ठोस पवित्र दर्शन हैं। गाँव से परे, शहर के दलितों के जीवन का अनुभव और संदर्भ अलग-अलग रूपों में रूपाकार होता है। आखिरकार दोनों के दुख:दर्द की यातना की अंतिम परिणिति का रूपाकार एक जैसा है। प्रकाश की कविताओं में गली-कूचे, दस्ता, छुआ-छूत, वेश्या, झगड़े-फसाद, रामपुरी चाकू, दादा लोग, मावली लोग, हिजड़े, मौला, फकीर, अघौरी भिखारी, महरोगी, सत्ता, मस्जिद, मंदिर, चर्च, हड़ताल, मोर्चे, तालाबंदी, लाठीचार्ज, अश्रुगैस, कर्फ्यू, तस्करी, कालाबाजारी, पुलिस यंत्रणा, आदि, शब्द कविता की सरंचना में मानवीय धड़कन पैदा करते हैं। इसकी वजह साफ है कि उनकी पृष्ठभूमि महात्मा फुले और डॉक्टर अंबेडकर कि थी, लेकिन उनके जीवन में मार्क्सवाद का प्रभाव भी गहरा था। इसीलिए उनके जीवन में फुले, अंबेडकर और मार्क्स कि विचारधारा का अंतरंग संबंध साहित्यिक कृति में उभरकर सहजता से दाखिल हो जाता है।
वहीं मुंबई महानगर के लुंपेन प्रोलेतेरित वर्ग की स्थानीय बोली, फुटपाथ पर गुजर-बसद करते लोगों कि बहुस्तरीय विशिष्टता याने लगातार असुरखा में जीना, बीमारी के आलम में पड़े रहने वालों कि बोली को पहली बार मराठी साहित्य ने एक नया आयाम दिया। उनके इसी अश्लील बोली के चलते उनकी अभिव्यक्ति रांगळी और बिंदास है। मसलन –
मैं समझ सकता हूँ
वट-फुट-हटेली-कटेली-चोर-चिटर,
धर्म के पाखण्डियों के
बैल-बाज़ार में चूतियों से भरे लोगों को
वहीं
मेहनत की रूखी-सूखी रोटी के लिए
गरीब-गुरबों के बीच
चल रही भयानक मारामारी को
चलते-चलते
और एक बात –
यह देश
जितना तुम्हारा है – उतना ही मेरा भी
सुप्रिसद्ध समीक्षक डॉक्टर होमी भाभा ने उनकी विख्यात समीक्षा की पुस्तक “लोकेशन ऑफ कल्चर” की भूमिका में प्रकाश की कविताओं में भाषा की सादगी, स्थानीय लोगों की संवेदना और इर्द-गिर्द की हकीकत पर गहरी पकड़ का जिक्र किया है। प्रकाश के विश्लेषण करने की क्षमता से प्रभावित होकर उनकी कविता का विश्लेषण भी किया। भाषा की गतिशीलता और सक्रियता की वजह से उनकी कविताओं के आशय और शश की तुलना ब्लॅक पैन्थर कवियों की कविता के साथ किया है। उनकी कविता की भाषा समाज के अत्यधिक गरीब वर्ग की भाषा होने के बावजूद कविता के गुंफन की विशिष्टता का अंदाज अलग है। इस भाषा में वर्गीय और वर्ण हिट दर्ज है। सत्ताधीशों और वर्चस्वादी भाषा को चुनौती देती है और वैकल्पिक दुनिया के स्वरों को मुक्त करने की छटपटाहट से कविता एक नई भाषा को जन्म देती है। कविता की यह प्रसव पीड़ा सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक शक्तियों से उनकी टकराहट की इच्छा शक्तियों का प्रतिफलन है। इस संदर्भ में “दादर के पुल के नीचे” कविता को डॉक्टर होमी भाभा उल्लेख भी करते हैं।
‘आ नाईट ऑफ प्रोफेसी’ फिल्म का चित्रण “दादर के पुल के नीचे” कविता पर है। इस फिल्म के निर्माता अमर कंवर के दक्षिण अफ्रीका में पत्रकारों से एक भेंटवार्ता में प्रकाश के काव्य जगत पर भाष्य करते हुए कहा, “प्रकाश जाधव की कवितायें न्याय की अनुपस्थिति का कथन हैं। भविष्य में जारी युद्ध अपराध के लिए न्याय की गुहार और गवाह है। न खत्म होने वाली कहानियों की शुरुआत है।” इसकी एक बानगी की एक मिशाल –
बार-बार निर्वासित होने से तंग आकार
मनुष्य अराजकता की ओर बढ़ता है
इस संदर्भ में
शब्द भी नहीं बच पाये हैं।
अणु अस्त्र के प्रकाश में
बिंदास्त रचे जा रहे हैं महाकाव्य
प्रत्येक प्रदेश एक-दूसरे से
दूर फेंके जा रहे हैं :
और मनुष्य की
बची-खुची सहनशीलता को
ठेला जा रहा है...
लोगों के विस्थापन और भयानक दहशत के नीचे गुजर-बसर करने की महाजटिल हालातों को लादने वालों से वह ठेठ प्रश्न करता है –
दहशत की भयानक यातना के
नीचे पिस रहे हैं लोग
और धांसू हो गए हैं ये शब्द
उथली संकल्पना की
दुकान को ठोकर मार कर पूछो
और –
पूछो मजदूरों से,
कारखानदारों से,
दर्शनिकों से,
जिस-किसी नर-माता ने
समागम जैसे अश्लीलता के आड़ में
सृजनशीलता का उदात्त इमला रचा था
उन लोगों के महान नाम बताओ
उनकी राष्ट्रीयता बताओ
बताओ...... बताओ....
आठवे दशक में यह प्रखर कवि जिंदा था और नौंवे दशक में मानसिक बीमारी की वजह से गुमनामी की ज़िंदगी में चला गया। उनका यह काल बहुत भयावह दौर से गुजरा। प्रकाश ने कविता के साथ-साथ सभी सामाजिक प्राणियों को अलविदा कर दिया था। बदनसीबी है कि मराठी के कवि और समीकक्षों ने उनकी दखल जितनी लेनी चाहिए थी, नहीं ली। लेकिन विश्व पटल पर उनकी खो गयी कविताओं पर समीक्षा और फ़िल्मकार कि दखलअंदाजी ने उनके साहित्य कि ठंडी पड़ गई आग के नीचे दाबी हुई चिनगिओं की आंच गर्माहट महसूस की।
और इसी आंच को तलाशने वाले कवि श्रीधर पवार, तुलसी परब और सामाजिक कार्यकर्ता सुबोध मोरे ने प्रकाश की बची-खुची कविताओं को खोजा और एक पांडुलिपि तैयार की। संकलन आने वाले समय में एक बार फिर से कवि को उस पृष्टभूमि में दाखिल होने का अवसर देगा।
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प्रकाश की दस कवितायें – मराठी से हिन्दी में अनूदित
(1) खेल
आओ
हम लोग देश-प्रदेश खेलें
आओ
हम लोग दंगे-वंगे खेलें
आओ
हम लोग लूट-पाट खेलें
आओ
हम लोग आग-फाग खेलें
आओ धव्स्थ कर दें असफलता के निराश बंगले
और डाका डाल....
ग्रेजुएशन से बेरोजगारी के दौर में
शिक्षा मंत्री को खूब दारू पीकर गली दें
किसी-न-किसी वजह से
पुलिस कस्टडी में आते-जाते रहें
पुलिस थाने के इन्क्वायरी कमरे में सिकवा लें हाथ-पैर
और नाप लें
कोर्ट की अड़सठ पायरियाँ
डेयरिंग है तो
किसी भी पार्टी का टिकिट हथिया लें
और हो जाएँ मालामाल
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दूसरी कविता – 2 :
जितने भी मुर्दे हैं
जितने भी मुर्दे हैं
एक सरकारी हुकुम से
उन्हें जीवित किया जाएगा
संविधान में संशोधन करके
मुर्दों ने सूचित किया
हमें फिर से मुठभेड़ करनी पड़ेगी –
अन्न-वस्त्र-आवास से
बेहतर होगा इससे उगे ही न सूर्य
और न दुबे चाँद
ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता
किया जा सकता है
ऐसा भी !
हमेशा की लिए कब्रस्तान चालू रखकर
और अघोरी लोग लग गए काम पर।
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तीसरी कविता –
कवि
तू मर करोड़ों की मौत
या मांगने लग भीख
दारू के एक बूंद के लिए तरस
या एक घूंट पानी के लिए
सज्जनों की महफिल से उठ
चांडाल-चौकड़ी के चक्कर से
फूलों की मासूम दुनिया से दूर हो जा
या समुद्र की पवित्र किताब से
दूर हो जा गाँव से
या मुल्क से
खुद की देह से परे हो जा
या आईने से
हे कवि तेरे शब्दों का अपार पसरा है
हमारी एकता को ताकत दे
हमारी सद गई संगठना को मजबूती दे
और
हमें उम्मीद रोटी की........
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चौथी कविता –
पियानो
इस उदास शहर के पियनों पर
जिसने छेड़ी है धुन
व्यस्त है क्राईम ब्रांच
विस्थापितों का पता
और बेक़सूरों से जबरन गुनाह काबुल करवाने में
व्यस्त है उल्लासनगर
जीवनावश्यक दवाईयों में साइनाइड मिलने में
इस शहर की
यही है सबसे ऊंची नाक
रिस रहा खेत-मजदूरों का सस्ता खून
हस्तमैथुन की पहली तारीख से
यनियन की एक दुकान से निकली सत्रह दुकानें
और मांग पत्र का निरपराध शव
मेनेजमेंट के टेबल पर
बहुत दिनों से सद रहा है
यह भी इस शहर की
और एक नाक है
मंच के इर्द-गिर्द के
विशाल भीड़ के सामने
आज़ादी के बाद –
झक्क उजाले की तरह भभकर
गुल हो जाने वाले करतबगिरी का खेल जारी है
बिजली के
बिल की दहशत की तरह लोग-बाग
यहाँ-वहाँ एकत्रित होते हैं
और बेमौत मर जाते हैं
गिर गया है कुत्तों की निगाहों से लेबर-कॅम्पस्
और मासूम बच्चों के भविष्य से दूर है
बंद-खिड़की-दरवाजे-दुकान-हॉटेल
यकायक भड़ककर उठने वाला वंशवादी वर्ग
चलनी सिक्कों की तरह प्रश्न उछालता है
पर्चों द्वारा,
घोषणाओं द्वारा,
इसके-उसके द्वारा
और छोड़ जाता है शनवारी चाल में
इंक्रीमेंट बंद कर दिये गए हैं
और पे-स्लिप पर मजदूरों के औरतों-बच्चों के
टपकते हैं आँसू भूख की त्रासदी भरे दिनों के
एक दलित युवती के साथ हुए बलात्कार के बाद
चूतियों जैसे लोग
और
संसद मौन है
यह इस शहर की कटी हुई नाक है
जिसने इस शहर के उदास पियनों पर छेड़ी है धुन
उसे समझ लेना चाहिए
राग-अनुराग की सिसकियाँ और आँखों को
अगर बजाना आया
तो सुनेगें
करोड़ों-करोड़ों लोगों का रोना
पियानो पर
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पाँचवी कविता :
भय और उम्मीद के बीच
एक ओर बंदूक से तने हुए रास्ते हैं
दूसरी ओर
विद्रोही मजदूर, बच्चे-बूढ़े और व्हिएतनाम –
झठके से उठ गया सपने में
और गश्त लगाते
पुलिस के हाथों में लग गया
मेरे पास न पहचान पत्र
और न लास्ट शो की टिकिट
पहचान के लिए
एकाध कागज दिखाने के लिए
डाला हाथ अंडरवेअर में
जेब ही नहीं था
बज गया है रात का एक
और उसके ओठों पर
जलती सिगरेट की रोशनी से
मेरी आँखों में ठहरी हुई रात
उजली होती चली गई
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छठवी कविता :
इशारा
प्रस्थापितों के विरोध के संघर्ष का
रक्तरंजित इतिहास है
कितने मारे गए
कितने हुए जख्मी
और कितने जेल में ठूँसे गए ?
और पूछते हो हिसाब
एक जलता हुआ शहर है
एक जलता हुआ घर है
एक उजड़ी हुई हरियाली है
और गवाह है वर्ग-युद्ध का
एक खंदक
देश-देश के हुकुमरानों को
मेरी आँख करती है –
एक इशारा .......
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सातवी कविता :
स्वयं – रचित नक्शे में
इस स्वयं-रचित नक्शे में
एक से बढ़कर एक बीमारू मगरूर सामंतशाह है
दिल ही दिल में घुटकर मरने वाले मजदूर, आदि –
किस झाड़ की पत्ती हैं
वेश्याओं की चमड़ी के एक्सरे हैं
केवल एक चादर मैली से है :
-अल्ला-हू-अकबर
और हरहर महादेव की
और लगातार उठ रहा है
हमारे दिल की गरई से
विद्रोह....
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आठवी कविता :
संशय – गुनाह और कानून
तेरे हाथ में जो चना-पुड़ी है
एक बंदी लगाई पुस्तक के कागज हैं
सिर्फ इतना ही सबूत बहुत है
संशय : गुनाह और कानून के लिए
तू लाख तर्क दे ले
भैया, उतने कम चने
हमेशा ऐसी ही पुड़ी में बांधकर देते हैं
जिसमें कबीर के दोहे या
फक-इज-अ-आर्ट से संबंधित लेख या
या तुकाराम के चुभने वाले अभंग होते हैं
इसे नज़रअंदाज करते हुए
उन्होंने जांच के लिए
जंगल को ताबे में ले लिया
और दंगों में जलकर रख हो गए घर को
गेट से घर के बीच ही में
तूने ले लिया था
एक चाकू और
पाँच लिटर मिट्टी का तेल
रेलवे में
इन दो चीजों के ले जाने में पाबंदी है
हुकुम तोड़ने के जुर्म में
तेरे जैसे एक ने बंदे को
कानून की खूंटी में टांग दिया जाएगा
घंटे भर के अंदर
कानून के नज़र में
जिस देश का नागरिक है तू
उसका कानून
वेश्या और ग्राहक के बीच के
दलाल जैसा है
वह एक कटोरी दही जमाने के लिए
बोतल भर दूध की बाली लेने के लिए
नहीं देखता
आगे-पीछे
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नौवी कविता
लेनिन
मंजिल-दर-मंजिल
थक गए हैं मजबूत रिश्ते-नाते
जुल्म सहते-सहते
और बना लिया है
मेरी पसलियों के अंदर घर
मेरी सांस दूषित हो गई है
लेनिन
टिकिट पाने के लिए
पागलों की तरह आपसी समझौता कर रहे हैं
इस हृदय से फुटकर निकलता रुदन
मुझे
मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन इतनी
लगती है आश्वासनें
बनावटी केवल
वोल्गा में उठी आग की लपटें
पहुँच गई हैं मेरे इर्द-गिर्द
लेकिन मेरा देश
विश्व का एक प्रचंड हिजड़ों का घर है
मुझको कबूल है कि दीवारों पर
लगाया जा सकता है रंग
दीवार – दीवार होती है
संस्कार नहीं हो सकती है
लेनिन
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दसवीं कविता :
दादर के पुल के नीचे
तीन ईटों को जमा कर
बना रही है यज्ञ का कुंड
और बन रही है उसपर
काजल की एक गुफा का वीभत्स अवशेष
नीम की जली लकड़ियाँ
रास्ते पर तैर रही साँसों का स्पर्श
साँसों के रुक जाने से परेशानी
हवा में तैरती उसके अस्तितत्व की राख
और छत-विछत शिल्प
वह छोड़ गई दादर के पुल के नीचे
उस निराश अंधेरे में
उसके सुन्न पड़े शरीर के बीच से
अस्वस्थ मैं हर रोज
शहर के बेंबी में उंगली घुसाकर
उसके गहरे जख्मों को देख
उल्टियाँ करता हूँ
और पूछता हूँ –‘ऐ माँ बता,
मेरा धरम,
कौन हूँ मैं
क्या हूँ मैं
हिन्दू या मुसलमान’
वह कहती है –
‘न हिन्दू, न मुसलमान
तू एक बेदस्तूर चिंगारी है
रंडियों का एक ही धरम है
सेक्स का शौक है
तो रख जेब में लिंग
धरम-वरम कुछ नहीं
और कुछ नहीं
दादर के पुल के नीचे खोल देती हूँ साड़ी’
और इस तरह हर बार
मेरे प्रश्नाकुल चेहरे पर उभार देती
ममता से भरे खुशी के पत्थरों की आकृतियाँ
बस मैं पूछता रहता
पूछता रहता
संभ्रांत लोगों से
‘कौन है वो? कौन है.... मेरा बाप ?’
उसके स्थन पर उभर आए विश्व के नक्शे निशान को
सहलाती हुई कहती – ‘थे कुछ हरमजादे’
निकली लड़के के मुँह से एक चीख –
‘ऐ छिनाल, बता सही... सही ......... वरना .......’
-‘एक हो तो बताऊँ...
मेरे जिस्म से लिपटकर कितने लोग छिपटे...
किस-किसका नाम .....
वे सिर्फ आए और गए’
-‘तुम रंडी हो...... रंडी हो.......’
लेकिन वह मग्न
भीख के बर्तन में उबले हुए मांस को तोड़ने में
उसके ओंठ अनजाने खून से लथपथ
आँखों में सजोएं हुए
दुनिया के सिर पर
घूमने वाली उस्तरा की धार की तरह बोली,
“मुझे थी भूख की चिंता और उन्हे जरूरत थी
मेरे ठंडी लाश सी जिस्म...”
मुझे दिखाती है –
हरे-भरे जख्मों की पपड़ी
खून में घुल-मिल गए सनातन महरोग।
मैं जीवन के इस गुप्प अंधेरे में ठोकर खाते हुए चीखता हूँ-
“बाप बताओ नहीं तो श्राद्ध कर...”
- संझोए हुए इन ख्वाबों के
सुरुंग में विस्फोट की तरह चीखती है,
- ‘दफना दूँगी भाद्रपद में’
और थूकती है चूल्हे की आग में।
करती है विस्फोट मेरे और उसके नंगेपन का
उसी समय अंतकरण का संतप्त ज्वालामुखी
दौड़ता है मेरे हृदय की ओर
- “तेरे कपड़े उतार दूंगा । तुझे नंगी कर दूंगा।”
- “अब क्या है मेरे पास।
मैं देती थी खून और वह जख्म।”
बाबुल के काँटों की तरह दाँतो को भींचते हुए चीखती है
- “जानना है तुझे तू कहाँ से आया है ?
उतार मेरे कपड़े ! कर दे मुझे नंगी
और गौर से देख ले
कैसे और कब जिसे तोडफोडकर तू बाहर निकला था।”
बेकाबू इंद्रियों पर बर्फ घिसते हुए
मेरे मूर्छित और सिहरन को दरकिरनार करते हुए
भागती है वह बेलगाम
उस समय ढेर सारे मिट्टी-पत्थर
फिसलते है दादर के पल पर से
और उठती है प्रतिध्वनि मेरे प्रश्नों की
दफन दर दिए मेरे खवाबों के
कहती है वह
“पत्थरों के दीवारों के छिद्र में
सुखाने के लिए रख दी तेरी ‘नाल’
एक दिन आई (माँ) समा गई
पल के नीचे के रौद्र समुद्र में
और सुसंस्कृत आसमां से गर्दन
मिलाने वाले हिमालय के सामने
मांग रही थी जिंदगी।
दादर के पुल के नीचे
फिलवक्त खाली समय में याद करता हूँ
उन अमूर्त्य दृशयों को
और छिन्न-भिन्न शिल्पों को।
निशब्द बहुत कुछ दे गई
जब भी पुल के नीचे खड़ा होता हूँ
फेंक जाते है कुछ चिल्लर सफ़ेदपोश
और शरीर में उद्रेक करने वाली आनुवांशिक रोग
फूट रहे थे मेरे चेहरे पर पट्टेदार नक्काशी
इन पट्टों से तराशा हुआ
खुल्लम-खुल्ला पैंथर हूँ मैं।
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