गटर बॉय – सिद्धार्थ देऊड़ेकर

 

सुबह का वक्त था। जब वे रास्ते पर आए तब रास्ता सुस्त अजगर की तरह पसरा हुआ था। रास्ते के दोनों ओर लाइट की रोशनी कम थी। रास्ते पर इक्का-दुक्का गाड़ियां गुजर रही थीं और कुछ हल्की-सी आवाज के साथ रास्ता काँप उठता था। काम के लिए आ रहे लोगों का शोरगुल था। इसके अलावा चारों ओर शांत वातावरण पसरा हुआ था। एक-एक कदम गिनते हुए मामा-भांजे आहिस्ता-आहिस्ता चल रहे थे। आज वह ‘गटर ब्वॉय’ की नौकरी पर लगने  वाला था। उसका मन अप्रत्याशित आनंद से लबालब भरा हुआ था। वहीं कौतुहल और भय भी था। ‘ब्वॉय’ की नौकरी की  कल्पना भर से उसके बाल मन में तरह-तरह के प्रश्न उठ रहे थे। मुलाकात के समय ही साहब ने कहा था कि तुझे हमेशा गटर में उतरना पड़ेगा... क्या तू ये काम करेगा? उसने विचलित मन से हामी भरी थी।

“परकास चल थोड़ी-थोड़ी च्याय पीएंगे। हाजिरी के लिए बहोत टायम हई।” मामा ने उसका हाथ पकड़कर ईरानी होटल की ओर ले जाते हुए कहा। उसी क्षण   उसके मन में कुलांचे ले रहे विचार ठहर गए।

“दो च्याय, एक पाव लगा।” मामा ने ऑर्डर दिया। उसी समय जिनसा आ गया। उसने पाव के साथ चाय का पहला घूँट पिया। मामा ने सिर्फ चाय पी। चाय के गरम-गरम घूंट पीते हुए बोलने लगा।

“मैं इस गटर खाते में पिछले बाईस सालों से काम करता हई। काले से गोरा हो गया। याने अब ये काम मेरुको गलीच्च नहीं लगता हयी। पैहले-पैहले कुछ भारी लगता था। बस इतना ही। और फिर बाद में तुझे भी कुछ नहीं लगेगा रे। मेरे सेक्शन में दो ‘ब्वॉय’ हये। लेकिन, भड़वे इतना काम कहाँ करते हयी? एक नहीं, तो दो जाली निकाले नहीं कि चले नहाने ...  अगर कुंडीवाली जाली है तो ऊपर से ही फावड़े से गारा निकालते हैं स्साले।  निकालते समय घबराने का नहीं। बिंदास काम करने का। और बास को एक सब्द से ज्यादा बोलने का नहीं। नहीं तो हरामजादे तकलीफ देंगे।” मामा काम के बारे में जानकारी दे रहा था और वह पूरे ध्यान से सुन रहा था। वहाँ अच्छा खासा शोरगुल होने लगा था। वाहनों की आवा-जाही बढ़ गई थी। सड़क पर से रोशनी भी गुल हो गई थी।

कामगारों की हाजिरी ली जा रही थी। लोग काम की जगह पर ताबड़तोब  पहुँचने लगे थे। हुड़दंग को देख मुक्कदम ने लाइन से आने को कहा और तब लोग लाइन से आने लगे थे। वह मामा के पीछे-पीछे चलने लगा।

“हातवकर आज इधर कैसे?” मध्यम ऊंचाई का एक दुबला-पतला आदमी   हँसते हुए मामा की ओर मुखातिब था।

तुरंत ही मामा के चेहरे पर हँसी खिल गई। उनसे हाथ मिलाते हुए मामा ने कहा, “तुम्हारे पास ही आया हूँ। ये मेरा भांजा  हयी। आज से तुम्हारे पास ‘ब्वॉय’ का काम करिगा। गाँव का छोरा हयी, इसीलिए इस पर जरा ध्यान रखो।”

“ये कोई बात हुई क्या !” वह बिना किसी वजह के लाल-पीला हो गया और आड़े-तिरछे दांत निपोरते हुए बच्चों जैसे हँस पड़ा।

“ठीक, हम आते हई।” मामा यह कहकर हाजिरी की जगह पर जाकर रुक गया।

सफाई कामगारों का हुजूम बढ़ने लगा था।  इतना हो-हल्ला हो रहा था कि कौन क्या बोल रहा है समझ से परे था। इसी वजह से हाजिरी लेनेवाले को  चिल्लाना पड़ रहा था। उसने ज़ोर से चिल्ला कर उसका नाम पुकारा। थोड़ा-सा घबराते हुए, जैसा मामा ने उसे बताया था, उसने कहा : "हाजिर हूँ"। तभी खाकी ड्रेस पहने व्यक्ति की निगाहें उस पर टिक गई। वह आश्चर्य से उसे देखने लगा। उसकी नजरों में आश्चर्यमिश्रित शरारत झलक रही थी। दरअसल, छोकरे की उम्र ही वैसी थी; चौदह-पंद्रह साल की. न तो वह दिखने में हट्टा-कट्टा था और न ऊंचा-पूरा....।

कामगार उस पर ताने कस रहे थे।  वह छुई-मुई पत्तों से भी कहीं अधिक सिकुड़ गया था। मामा भी हाजिरी लगाने के लिए जल्दी से उस ओर चले गए थे।  कटाक्ष भरे ताने उसे नि:सहाय स्थिति में ले जा  रहे थे।

“तू ‘ब्वॉय’ है क्या?” घूरती नजरों से बूढ़े मद्रासी ने हाथ पर तंबाकू घोंटते हुए उससे पूछा।

घनी मूँछें और मजबूत काठी के उस धुस्स काले बूढ़े की ओर उसने भयभीत निगाहों से देखा और केवल गर्दन हिला दी। बातचीत  टालने के लिए उसने निगाहें जमीन पर गड़ा दी थी। दारू के नशे में धुत्त वह बेकाबू आदमी हवा के झोंके की भांति उसके सामने खड़ा हो गया और संभलते हुए बोलने लगा।

“कौन है रे ? ‘ब्वॉय’ ! क्या कल हुई भरती का...... ? देखो रे, देखो! इतना छोटा-सा  छोकरा ! ये सायब बी कैसे मादर..... ! झांट बराबर के छोकरे को काम पर रख लिया।   मेरे सांड जैसे मोटे-ताजे लड़के को काम पर नहीं लिया। इस छिल्लुट को काम पर रख लिया है। मैं पिछले पच्चीस सालों से इस गटर खाते में काम कर रहा हूँ। ईसकु क्या कहूँ….. क्या फायदा ? भड़वी को पैसे चाहिए.... अभी ही आफिस जाता हूँ। और येक.....येक की माँ ..........” होंठ चबा-चबाकर और दांत पीस-पीसकर  वह आदमी बोल रहा था।

उस आदमी के गुस्से से वह घबरा गया... थरथर कांपने लगा... उसके चेहरे पर भय की परतें साफ दिख रही थीं। उसी समय सभी कामगार उत्सुकता से उसकी ओर देखने लगे थे। उसमें इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि उन लोगों से  आँख मिला सके। उसकी नजरें अपने-आप जमीन में गड़ गई। कुछ कामगार उस झगड़ालू को चेतावनी दे रहे थे, वहीं कुछ कामगारों के हँसी के गुब्बारे फूट रहे थे। उन लोगों की बातों को अनमना-सा वह अनसुना कर रहा था।

डी॰ए॰ साहब कामगारों के विभाग का बँटवारा करने के लिए उठे। बहुत देर से चल रहा हल्ला-गुल्ला तत्काल शांत हो गया। वे ऊंची आवाज में चिल्लाने लगे, “आज कौन-कौन नए ब्वॉय...?” देखते ही देखते तीन लड़के उसके सामने खड़े हो गए। उन तीनों में वह एकदम कमजोर दिख रहा था। उपस्थित चेहरों से नजर चुराते हुए वह उन दोनों के करीब आकर खड़ा हो गया था।

“क्या नाम है तेरा ?”

“नारायण सखाराम”

“तेरा रे ?”

“और तेरा ?” साहब कागज के टुकड़े पर नाम लिखते हुए उसकी ओर देखकर बोला।

उसने किसी तरह बेसुध हालत में कहा, प्रकाश दगड़ू।

“किसने तुझे काम पर रख लिया?” क्या तू भरा हुआ फावड़ा उठा सकेगा?” साहब ने गुस्से में कहा और चिंता में डूब गए।

“भड्वे लोगों की आँखों में सिर्फ पैसा दिखता है ! सोचा ही नहीं कमजोर लड़का कैसे काम करेगा?” मुकद्दम की बात का समर्थन करते हुए  किसी कामगार ने  और दो शब्द जोड़ दिये थे। तभी साहब के गोरे गालों पर भरी गर्मी के समय में नदी के पानी में उठी हल्की  तरंग की तरह हँसी झलक उठी। उस मुकद्दम के बोल एक जल्लाद हत्यारे की तरह उसके कलेजे के गहरे भीतर धंस गए थे। उसी क्षण में वापस लौट जाने का विचार मन घूमने लगा। काम पर लगाने वाले बाप और इस तरह बोलनेवाले के बारे में भयंकर संताप मन में उबलने लगा था।

साहब द्वारा तय किए गए काम की ओर वे लोग निकल पड़े।

वह लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ रहा था, जैसे पैरों में बेड़ियाँ बांध दी गई हो। विचलित मन और दिमाग में अनेक तरह के विचार उमड़ने-घुमड़ने रहे थे। उसे कुछ समय पहले झगड़ने वाले उस आदमी की याद हो आयी। उस आदमी ने कहीं मेरे बारे में अंट-संट बता दिया तो? साहब मुझे काम पर रखने को लेकर नाराज हो जाएंगे... मुझे कहीं नौकरी से तो नहीं निकाल देंगे? कल्पना मात्र से उसका दिल दु:खने लगा था। वे कैसे समझेंगे कि घर की खस्ता हालत की वजह से बाप ने मुझे काम पर भेजा? इस अहसास से वह उदास और बेचैन हो गया।

छोकरे को बेहद गंदे काले रंग के पानी से भरे गटर के पास खड़ा किया गया. गटर के आस-पास का फुटपाथ मल-मूत्र से अटा पड़ा था; खूब बदबू उठ रही थी। वह सोचने लगा क्या उसे इस मैले से भरे गटर में उतरने को कहा जाएगा? पहले गटर विभाग में रहे किसी व्यक्ति ने  कहा था कि आदमी गटर में डुबकी मारता है।  सोचकर ही उसके शरीर में सिहरन उभर आई।  वह चिन्तित होकर उस वीभत्स दृश्य को देखने लगा।

एक लेबर उस गटर के पानी में लगी जाली  को उठाने की कोशिश करने लगा। वह जाली रूठकर जैसे  और घट्ट बैठ गई हो। उसने तरकीब और  ताकत के बल पर  जाली निकाली। वह जोर से चिल्लाया, “ला... दतार ला...”,  

लगा कि उससे नहीं बोला गया है।  इसी वजह से वह उसकी ओर ताकता रह गया। लेकिन, वह फिर से चिल्लाया।

“ऐ डेफू  खाली-पीली ताकता रहेगा क्या? ओ दतार... कांटेवाला फावड़ा लेकर आ।” गुस्से से बारे स्वर को सुनकर वह अपनी जगह से जरा-सा हिला और विचलित नजरों से इधर-उधर देखने लगा।

“धत्त तेरी की,।” वह ककर्श स्वर में बोला।

उसके बाद उसकी अनभिज्ञता पर मन ही मन हँसा और बोला, “अरे बाबा, वो दतार नहीं है। अरे वो, वो  जिसमे पाँच लोहे की छड़ी है न, उसे लेकर आ।” समझ में आने पर वह शर्मिंदा हो गया। वहाँ बैठे लेबर खिल-खिलाकर हंसने लगे। वह शर्म और भय से दतार लेकर उस लेबर के पास जाने लगा।

मलयुक्त पानी में अनिच्छा से पैर डालते ही उसे अजीब सा लगने लगा, बेचैनी   होने लगी। लेबर के आदेशानुसार उसने जाली में दतार को फंसाया। और जाली को उठाया “अरे तेरी माँ की ....., दतार से कपड़े गंदे हो गए। तेरे बाप ने ऐसे ही उठाया ....? छोकरे काम पर आते ही कपड़े उतार देना... समझे। तभी दतार को फंसाना।” पीछे से मुकद्दम की आवाज आई और वैसे ही उसने पलटकर पीछे देखा। देर से नदारद मुकद्दम अचानक आ गया था। उसे संबोधित करते हुए काम की जानकारी हमेशा की भाषा-शैली में देने लगा।

मुकद्दम के अभद्र शब्द उसके दिल में चुभ  गए। बिजली की भांति  दिमाग में घुस गए। क्षण भर के लिए लगा... साले का थोबड़ा फोड़ दूँ, किन्तु दूसरे ही पल लगा कि यह उचित समय नहीं है... ध्यान आते ही कि जीवन भयानक दरिद्रता में उलझा और फंसा हुआ है, उसने गुस्से के घूंट को निगल लिया।

अब वह केवल चड्ढी पर ही खड़ा था। उसका एंड-बैंड शरीर सैकड़ों लोगों के निगाहों के सामने गटर में उतरने के लिए तैयार था। सड़क से आने-जाने वाले सूटबूट पहने पुरुष, स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चे, रंग-बिरंगी पोशाकों में सजी-सँवरी सम्पन्न महिलाएं, उसकी ओर हिकारत के भाव से देखकर दूर से ही  चली जा रही थीं। उन सभी को देखकर उसे उसके बचपन के स्कूल का प्रसंग  याद आ गया। जब वह तीसरी में पढ़ता था। एक दिन उसके स्कूल में ऑफिसर साहब ने आये थे। उस समय उसने कुछ प्रश्न पूछे थे। इन प्रश्नों के सटीक जवाब से खुश होकर साहब ने उसे शाबासी दी और पूछा था, ‘तू पढ़कर क्या बनेगा?’ तपाक से उसने छाती फुलाकर कहा, ‘बड़ा साहब बनूँगा।” और आज...  उसकी याद से ही वह मुरझा गया। उदास हो गया। और अगले ही पल मुक्कदम की अश्लील बात की याद आते ही तैश से पानी में उतर गया। गुस्से में उसने निचली जाली को दतार लगाकर सहजता से ऊपर उठा लिया।

लेबर ने गटर के ऊपरी हिस्से से जमा पानी के अंदाज को महसूस किया और दतार को नीचे-ऊपर घुमाता रहा। क्षण भर में पानी नीचे बैठ गया। बड़ी तादाद में गंदा पानी ज़ोर से बहने लगा।

गंदा पानी पूरी तरह बह गया था। ऊपर पत्थर, काँच, कील और कीचड़ का गारा गटर में नजर आ रहा था। जाली में रुका हुआ मैला उसे चुनौती दे रहा था। मनुष्य मरने के बाद नरक में जाता है। उसने इस तरह की दंत कथाएँ सुना था। किन्तु वह किशोर-अवस्था में यह अनुभव महसूस कर रहा था। वह अपने निष्कलंक हाथों से मनुष्य का मैल साफ करने वाला था।

वह गटर में उतरने ही वाला था कि उसके पैर उसी जगह रुक गए। पूरे शरीर में सिहरन भर गई थी। गटर में एक बड़ा चूहा अधमरी हालात में गिरा पड़ा था। चूहे के शरीर पर असंख्य कीड़े कुलबुला रहे थे। उसने जैसे ही फावड़े से चूहे को बाहर निकाला और बदबू से वह सकपका गया। उसका जी मचलने लगा। शरीर थरथराने लगा। उसने फिर से उत्तेजित निगाहों से गटर में झाँका। मैले में अभी भी कीड़े रेंग रहे थे।

“नीचे उतरता या नहीं ..... ? नहीं उतरता है तो घर का रास्ता नाप।” मुकद्दम ने ज़ोर से चिल्लाकर कहा। और वह घबरा गया। मुकद्दम और लेबर खिलखिलाकर हँसे। उनका व्यवहार और द्वेष उसके अन्तर्मन में चुभने लगा। इस तरह के व्यवहार से आँखें  सुर्ख लाल हो गई थीं। आँसू की झड़ी लग गई थी। उसी अवस्था में वह गटर  में उतर गया और भीतर  की जाली साफ करने लगा।

“क्या रे बच्चू बराबर साफ किया कि नहीं? मुकद्दम गटर की जाली को कमछी  से ठोंकते हुए कह रहा था। उसने मुकद्दम को केवल घूरकर देखा। एक शब्द भी नहीं कहा।

“तो अब अगली जाली को खोलो रे! और दो-तीन जाली साफ करना है। बड़ा साब आने वाला है।  तो आज जल्दी जाने को नहीं मिलेगा।” मुकद्दम के तानों से उसकी तकलीफ़ें और बढ़ गई। यानी और दो-तीन जाली साफ करना पड़े तो.....! यह सोचकर, उसका दिल टूटने लगा। वह बहुत ही दयनीय नजरों से मुकद्दम के चेहरे की ओर देखने लगा। मुक़द्दम के कहने के पहले, एक ने कहा,

“ऐ, क्या रे..... कैसा आदमी है तू ! छोकरे की हालत तो देख कैसी हो गई है।  “उसने दो जाली का कचरा निकाला है।” एक मद्रासी लेबर मुकद्दम से हुज्जत करने लगा। यह सुनकर उसे अच्छा लगने लगा। तभी बाकी के लेबर भी काम बंद करके मुकद्दम से छुट्टी के लिए हुज्जत करने लगे।

“अरे! लेकिन साब आनेवाला है। वह सभी की गैरहाजिरी लगा देगा... मेरा नाम नहीं लेना रे।”

“अरे चल हठ, तेरे साब की तो.......चुप बैठ......”

“तो जाओ मुझे कुछ नहीं कहना....” मुकद्दम बोकुड़ की तरह गुर्राया और छुट्टी  हो गई।

काम कर लेने के बाद उसने बार-बार नहाया। साबुन से शरीर को खूब घिसा। लेकिन, उसके शरीर की बदबू जस की तस बनी हुई थी। कुछ भी कर लेने के बाद भी बदबू नहीं जा रही थी। अंतत: थक-हार कर घर की ओर निकल पड़ा। सूर्य माथे पर आ गया था। खूब आग उगल रहा था। उसकी जान शरीर  फोड़कर बाहर निकलना चाहती थी। मोटर-गाड़ी, मनुष्य की भीड़-भाड़ के बीच वह लड़खड़ाते हुए चल रहा था। मन में उमड़ रहे विचार रह-रहकर आ-जा रहे थे। उसके मन से काम का दृश्य ओझल नहीं हो पा रहा था। बाप ने  इस काम के बदले दूसरा काम क्यों नहीं देखा? उसे खुद पर तरस आ रहा था। बाप की  तो ऐसी-तैसी..! बाप ने तो ज़िंदगी दारू, सट्टे में झोंक दी और आज बेटे को इस गंदगी में...  इस दुनिया की गंदगी उठाने से तो अच्छा होता किसी होटल में कप-बशी धोने के काम पर लगाया होता। क्यों लगाता? इस गंदगी के काम में पैसे जो ज्यादा मिलते है। धिक्कार है ऐसी ज़िंदगी जीने में। केवल बिल्लसभर पेट भरने के लिए ये काम करना पड़े। क्या इस देश में स्वाभिमान से जीने के लिए इसके  अलावा और कोई दूसरा काम नहीं है? क्या जीवन भर दुनिया का मैला ढोते-ढोते जीवन खत्म हो जाएगा? आसमान से बरसते भुर-भुर पानी की तरह उसके मन में विचारों के बौछारों की  झड़ी लग गई।

कमरे में उसके पहुँचते ही कामदार आ गए थे। बस यही एक स्वर  कि  देहात के लोग कौतुकवश उसके काम के बारे में पूछ रहे थे, किन्तु उसके चेहरे के हाव-भाव जस के तस थे। वह नि:शब्द, निमग्न था।

“अरे प्रकाश बाबा काम कैसा भी हो, पेट के लिए करना ही चाहिए। वहणी-भाऊ और गाँव के अन्य लोग रोटी के लिए कैसे आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं। नाज-नखरे करने से तो नहीं चलेगा। आज क्या नौकरी यूं ही मिल जाती है? हमारे पड़ोसी दामू का लड़का मैट्रिक पास है।  फिर भी बेरोजगार है। और कहना होगा कि तेरा तो नसीब खुल..... !” मुंबई की नानी उसके मौन को तोड़ने के लिए उपदेश दे रही थी।

आधी रात बीत गई थी। गली के लोग गहरी नींद में सो रहे थे। चारों तरफ नीरव शांति पसरी हुई थी। ख़र्राटे लेनेवाले लोगों की विचित्र आवाज  वातावरण में अजीब सी कंपन पैदा कर रही थी। अभी भी काम के समय की दुर्गन्ध उसके दिमाग में भरी हुई थी। सिर ठनक रहा था। नाक से पानी की बूंद रिसने लगी थी और वह बिस्तर पर यूं ही लेटा हुआ था।

उसके मस्तिष्क में कई तरह के भयानक विचार चल रहे थे। घर की दयनीय हालात और यही दृश्य रह-रहकर उसके आँखों के सामने घूमने लगा था। बारिश के समय घर में गेंडुल जगह-जगह बिलबिलाते रहते हैं। ठीक इसी तरह भूख से पीड़ित सगे-संबंधी भी घर में रेंगते रहते हैं ! स्कूल से लौटने पर भूख की वजह से रोटी के लिए हो-हल्ला मचाने से  गुस्से में माँ बेल्ट से जबर्दस्त पिटाई करती थी। माँ के महाकाली के अवतार को देख भयानक भूख होने पर भी वहाँ से रफा-दफा हो जाते थे। भाई-बहनों के शरीर में मांस बचा ही न था। सिर्फ अस्थि पंजर दिखते थे। बारिश के दिनों में जगह-जगह घर में रिसता पानी… हर कोण से दुर्बल हो चुका नाना बस जिये जा रहा….  कांपते शरीरवाली दादी  और  कदम-कदम पर मरनेवाली माँ.... “ऐसी परिस्थितियों में बाबा, मुंबई जा रहे हैं तो यहाँ के हालात  देखते जाओ ! और सबसे बातचीत कर..... ।” उस समय दादा के थोबड़े के आँखों के गहरे गड्ढे से बहते आँसू..... इन चित्रों की चिंता कहीं बाबा के दिल के किसी हिस्से में चुभ गई थी।

नाना भाव-विभोर हो गया... आँसू बहने लगे... बिस्तर का अभिषेक होने लगा। रातभर दरिद्रता पर उसका अनुसंधान चलता रहा। कई तरह से विचार करने के बाद नाना ने हार मान ली।

सुबह के साढ़े-चार बज रहे थे। सार्वजनिक नल में पानी आ गया था। आहिस्ता-आहिस्ता चाल के लोग उठने लगे। दांतों में गुड़ाकू मलते हुए सब नल के पास एकत्रित हो रहे थे। उसकी नींद पूरी नहीं हुई थी। सिर ठनक रहा था। पूरा शरीर जकड़ गया था। फिर भी जैसे-तैसे उठ गया। नित्यक्रिया को निपटाया और काम के ठीये की ओर तेज गति से उसके कदम बढ़ने लगे... जिम्मेदारी की खातिर…

---------------------------------------------------------------------------------------------  सिद्धार्थ देऊड़ेकर - 09420843646

                              मराठी से अनुवाद – गोपाल नायडू

                              मोबाइल : 09422762421

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